विकास के मायने और आवास की समस्या

विश्व की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में एक भारत की आन्तरिक तस्वीर कई मायनों में चिंताजनक है ! सवाल है हमें आजाद हुए एक लम्बा अरसा बीत गया, फिर भी ये समस्याएँ इतनी गंभीर क्यों बनी हुई हैं ? किसी भी देश के लिए वास्तव में विकास के क्या मायने हैं ? क्या किसी देश की अर्थव्यवस्था के बड़े आकार को देखकर यह माना जाना चाहिए कि वह देश प्रगति कर रहा है ? सवाल है कि क्या भारत सचमुच बदल रहा है ?
भारत के सामने कई जटिल आन्तरिक समस्याएँ हैं ! ये ऐसी तस्वीरें हैं जो किसी राष्ट्र की प्रगतिशील छवि पर एक प्रश्नचिह्न लगाती हैं ! प्रगति का मतलब सिर्फ अर्थव्यवस्था के बड़े आकार से नहीं है, बल्कि समग्र रूप में विकास का मतलब - आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व नैतिक विकास से है ! जरा गौर कीजिए, विकास के इन तमाम पहलुओं के मद्देनजर हम कितने विकसित हुए हैं ! प्रश्न उठता है कि इन तमाम चीजों के लिए जिम्मेवार कौन है- केवल शासन ? या फिर देश की आम जनता भी ? कहना गलत नहीं होगा कि इसके लिए कहीं न कहीं शासन के साथ-साथ आम जनता भी जिम्मेवार है !
* सरकार की जवाबदेही
१. आवास की समस्या-भोजन, वस्त्र एवं आवास- ये तीन मानव की आवश्यक आवश्यकताएँ हैं जिनके अभाव में मानव जीवन निरर्थक प्रतीत होता है ! इनसे वंचित मनुष्य कतई खुशहाल नहीं हो सकता ! संयुक्त राष्ट्र डेवलपमेंट साल्यूसंश नेटवर्क ( यूएनएसडीएसएन ) द्वारा जारी विश्व खुशहाली रिपोर्ट- २०१८ में १५६ देशों की सूची में भारत को १३३वां स्थान दिया गया है ! इसी रिपोर्ट में भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान (७५), बांग्लादेश (१०१) व श्रीलंका (११६) भारत से अधिक खुशहाल देश हैं ! भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की एक बड़ी आबादी के पास रहने के लिए घर नहीं है ! इस कारण इन्हें सड़क किनारे जीवन-यापन करने को मजबूर होना होता है ! हालाँकि खुशी की बात यह है कि नए बजट के अनुसार सभी के लिए आवास के लक्ष्य को २०२२ तक पूरा करने के उद्देश्य से २०१९ के अन्त तक ग्रामीण क्षेत्रों में एक करोड़ से अधिक घरों का निर्माण किया जाएगा ! आशा है, इन सरकारी प्रयासों से आवास सम्बन्धी समस्या का समाधान होगा अथवा इनमें कमी आएगी !

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