मुगलकालीन चित्रकला : मुगलकाल के प्रमुख चित्रकार Mughalkalin Chitrakala

(Mughalkalin Chitrakala)मुगलकालीन चित्रकला मुगलकाल के प्रमुख चित्रकार(मुगल चित्रकला शैली)




[मुगल चित्रकला शैली, इंडो-इस्लामिक,अरबस्क आदि एवं मुगल चित्रकारों के नाम ]


मुगल चित्रकला की स्थापना हुमायूं के शासनकाल में हुई थी. भारत में द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना (शेरशाह) के बाद हुमायूं का अपने निर्वासन काल में फारस के दो प्रमुख और प्रसिद्ध चित्रकारों (अब्दुस्समद और मीर सैय्यद अली) से सम्पर्क हुआ जिन्होंने हुमायूं के संरक्षण में भारत में मुगल चित्रकला का मार्ग प्रशस्त किया. मीर सैय्यद अली फारस के विख्यात चित्रकार बिहजाद का शिष्य था. बिहजाद को 'पूर्व का रैफेल' भी कहते हैं. बिहजाद प्रायः बाबर के समय में भारत आया था. बाबर बिहजाद को एक उच्च कोटि का चित्रकार मानता था. इस आशय का उल्लेखo बाबर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुके-बाबरी' में की है.
मुगल कालीन चित्रकला
                    
मुगल चित्रकला के सम्बन्ध में इतिहासकार सतीश चन्द्र लिखते हैं- " मुगल चित्रकला ने धीरे-धीरे एक विलक्षण चित्रकला शैली के रूप में मान्यता प्राप्त कर ली है. उसके पीछे चित्रकला की एक समृद्ध परंपरा थी, जिसका सहारा लेकर उसने सत्रहवीं सदी में पूर्ण परिपक्वता प्राप्त की. उसने आगे चित्रकला शैली की एक ऐसी सजीव परंपरा निर्मित की जो मुगलों की आभा के तिरोहित हो जाने के बाद भी विभिन्न रूपों में देश के अलग-अलग हिस्सों में कायम रही."

मुगल चित्रकला


प्राचीन भारत में चित्रकला की एक उन्नत और समृद्ध परंपरा थी. अजन्ता के भित्ति-चित्र इस समृद्धि के प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं. बाद के काल में विशेषकर मध्यकालीन भारत में (तेरहवीं-चौदहवीं) शताब्दी में इसमें ह्रास के कुछ तत्व देखे जा सकते हैं, तथापि यह पूर्ण रूप से मृत नहीं हुआ था. भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही मुगल शासकों द्वारा (विशेषकर हुमायूं, अकबर, जहांगीर और शाहजहां ) चित्रकला को प्रस्रय देने के कारण मुगल चित्रकला शैली ने एक विलक्षण चित्रकला शैली के रूप में अपने-आप को स्थापित कर लिया. चित्रकला शैली के विकास में अब कागज के प्रयोग के साथ एक नए चरण की शुरुआत हुई. अब चितरकारों को रंग चुनाव की अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होने लगी और साथ ही अब वे चित्र के माध्यम से अपने को बेहतर व्यक्त करने में समर्थ महसूस करने लगे.
                               
बिहजाद के दोनों शिष्य- मीर सैय्यद अली व अब्दुस्समद हुमायूं के साथ भारत आए थे. अब्दुस्समद द्वारा तैयार किए जाने वाले चित्रों में कुछ चित्र जहाँगीर द्वारा संकलित 'गुलशन चित्रावली' में संकलित हैं. 'हम्जनामा', जिसे 'दास्ताने अमीर हम्जा' भी कहते हैं, मुगल चित्रकला शैली में चित्रित सबसे महत्वपूर्ण चित्र संग्रह है. 'हम्जनामा' मीर सैय्यद अली व अब्दुस्समद के नेतृत्व में देश के विभिन्न भागों से बुलाए गए लगभग 1 0 0 चित्रकारों के समूह द्वारा तैयार किया गया जिसे पूरा करने में करीब पंद्रह साल लगे. 'हम्जनामा' में लगभग 1400 पृष्ठों को चित्रित किया गया. इस प्रकार यह एक तरह से भारतीय चित्रकारों के लिए प्रशिक्षण का काल साबित हुआ.



(मुगल शासक, मुगल चित्रकला शैली और प्रमुख चित्रकार)

हुमायूं के दरबार के प्रमुख चित्रकार थे- मीर सैय्यद अली और अब्दुस्समद.


अकबर ने मुगल चित्रकला को एक व्यवस्थित रूप देते हुए चित्रकारी हेतु एक अलग विभाग स्थापित किया. अबुल फजल वे 'आइने अकबरी' में पन्द्रह प्रसिद्ध चित्रकारों का उल्लेख किया है जिनमें तेरह हिन्दू चित्रकार थे. अकबर के दरबार के मुख्य चित्रकार थे- दसवन्त, बसावन महेश, लाल मुकुन्द सावलदास, अब्दुस्समद, सैय्यद अली आदि. अकबर के काल में 'रज्मनामा' पाण्डुलिपि तैयार हुई. इसमें दसवन्त के बनाए चित्र हैं. मुगल चित्रकला के इतिहास में 'रज्मनामा' को 'मील का पत्थर' स्वीकार किया गया है. दसवन्त के द्वारा बनाई गई अन्य कलाकृतियों में 'खानदाने- तैमूरिया और तूतीनामा' शामिल हैं.

बसावन अकबर के दरबार के मुख्य चित्रकारों में से एक था. बसावन को चित्रकला के सभी पक्षों में सिद्धहस्तता प्राप्त थी. बसावन की उत्कृष्ट कृति है- 'एक कृशकाय घोड़े के साथ मजनूं का निर्जन क्षेत्र में भटकता हुआ चित्र'.
पहली बार भित्ति-चित्रकारी (Fresco-Painting) का प्रारंभ अकबर के काल में ही हुआ.

जहांगीरकालीन प्रमुख चित्रकार अथवा जहांगीर के दरबार के प्रमुख चित्रकार

मुगल शासक जहाँगीर के काल में मुगल चित्रकला शिखर पर पहुँच गई. जहाँगीर इस मामले में पारखी व्यक्तित्व का धनी था. जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुकेे जहांगीरी' में लिखा है कि "कोई भी चित्र चाहे वह किसी जीवित चित्रकार द्वारा बनाया गया हो अथवा मृतक चित्रकार द्वारा, मैं चित्र को देखते ही बता सकता हूँ कि यह किसकी कृति है. यदि ोई चित्र विभिन्न चित्रकारों द्वारा बनाया गया है तो भी मैं उनके चेहरे अलग-अलग कर बता सकता हूं कि कौन से अंग किस चित्रकार ने बनाई है." जहाँगीर ने हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार 'आकारिजा' के नेतृत्व में आगरा मेें एक चित्रशाला की स्थापना की. जहाँगीर का काल मुगल चित्रकला का स्वर्ण-काल था. शिकार, युद्ध और दरबारी दृश्यों को चित्रित करने के अलावा आकृति-चित्रण, पशुओं व फूलों आदि के चित्रांकण में जहाँगीर के शासनकाल में विशेष उन्नति हुई. उस्ताद मंसूर और अबुल हसन इस काल के दो बड़े नाम थे. मंसूर पक्षी विशेषज्ञ चित्रकार था जबकि अबुल हसन व्यक्ति चित्र विशेष में निपुण था. जहाँगीर ने मंसूर को ' नादिर-उल-्सर' तथा हसन को 'नादिर-उल-जमा' की उपाधि से नवाजा था. ' साइबेरिया का बिरला सारस' तथा 'बंगाल का एक अनोखा पुष्प' मंसूर की उत्कृष्ट कृतियों में शामिल हैं.

जहाँगीर के दरबार के प्रमुख चित्रकार/जहांगीरकालीन प्रमुख चित्रकार - फारूखबेग, बिसनदास, मंसूर, दौलत, मनोहर व अबुल हसन आदि.

शाहजहाँ को यद्यपि चित्रकला में विशेष रुचि नहीं थी तथापि उसने इसे आश्रय प्रदान किया था.

शाहजहाँ के काल के प्रमुख चित्रकार/शाहजहांकालीन प्रमुख चित्रकार/शाहजहाँ के दरबार में प्रमुख चित्रकार**- फकीर उल्ला,मीर हाशिम, अनूप, चित्रा, मुहम्मद नादिर, हुनर व मुरार आदि.


औरंगजेब ने चित्रकला को ईस्लाम विरुद्ध मानते हुए दरबारी आश्रय को समाप्त कर दिया. इसलिए दरबारी चित्रकला अब समाप्त हो गई.

औरंगजेब की चित्रकला में रूचि के अभाव ने चित्रकारों को देश के विभिन्न भागों में बिखेर दिया. इसका एक परिणाम यह हुआ कि इससे राजस्थान और पंजाब के क्षेत्रों में चित्रकला शैली का विकास हुआ.


मुगलकालीन विशेष चित्र और उनके चित्रकार

Mughalkalin Chitra

1. कृशकाय घोड़े के साथ मजनूं का निर्जन स्थान में भटकता चित्र......बसावन
2. साइबेरिया का बिरला सारस....मंसूर
3. बंगाल का अनोखा पुष्प....मंसूर
4. ड्यूटर के सन्त जान पाल का चित्र....अबुल हसन
5. चिनार के पेड़ पर अगणित गिलहरियों का चित्र......अबुल हसन और मंसूर
6. बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह का चित्र....फारूखबेग





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