अलाउद्दीन खिलजी, रानी पद्मावती और चित्तौड़ की कहानी का सच


अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ (चित्तौड़गढ़) पर आक्रमण और रानी पद्मावती की कहानी


1206 ई. में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद लगभग 85 वर्षों तक का सल्तनत का इतिहास साम्राज्य के विस्तार से प्रेरित न होकर सल्तनत के विखंडन को रोकने से अधिक प्रेरित था. सल्तनत की सत्ता में खिलजियों के आने के बाद सल्तनत के विस्तार का युग शुरू होता है.

अलाउद्दीन खिलजी और चित्तौड़ अथवा चित्तौड़गढ़

चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी थी जहां गुहिलौत वंश के राजपूतों का शासन था. यद्यपि चित्तौड़ काफी समय से राजस्थान के चालुक्य और गुहिलौत शासकों के मध्य विवाद का विषय बना हुआ था, लेकिन उस समय यह गुहिलौत वंश के शासक राणा रतन सिंह के कब्जे में था. चित्तौड़ का किला राजस्थान के सर्वाधिक मजबूत किलौं में से एक मानी जाती थी. 1303 ई.में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर किले का घेरा डाल दिया. अमीर खुसरो जो चित्तौड़ अभियान में अलाउद्दीन के साथ गया था, ने लिखा है कि लगभग 6 महीने की घेराबंदी के बाद रतन सिंह किले से बाहर आया और उसने आत्म-समर्पण कर दिया. यद्यपि रतन सिंह के साथ अच्छा सलूक किया गया लेकिन किले में शरण लिए हुए लगभग 30000 किसानों का कत्ल कर दिया गया. अमीर खुसरो चित्तौड़ में जौहर किए जाने का कोई उल्लेख नहीं करता. राजपूत प्रमाणों के अनुसार रतन सिंह ने सात माह तक बहादुरी से मुकाबला किया. अन्त में किले पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया. राजपूत स्त्रियों ने रानी पद्मावती के साथ जौहर कर ली और रतन सिंह युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया. चित्तौड़ विजय के बाद अलाउद्दीन ने यहां का शासन-प्रबन्ध अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंप दिया और उसी के नाम पर चित्तौड़ का नया नाम खिज्राबाद रख दिया. राजपूतों के दबाव के कारण खिज्र खाँ को 1311 में चित्तौड़ छोड़ना पड़ा . इस परिस्थिति में अलाउद्दीन ने अपने एक मित्र राजपूत सरदार मालदेव को चित्तौड़ का अपना प्रतिनिधि शासक नियुक्त किया. रतन सिंह के एक वंशज हम्मीर देव ने मालदेव को बहुत परेशान किया. यद्यपि मालदेव ने उसे संतुष्ट करने के इरादे से अपनी पुत्री का विवाह हम्मीर देव से कर दिया, परन्तु हम्मीर देव ने फिर भी चित्तौड़ पर अपना कब्जा करने का प्रयास जारी रखा. 1321 में मालदेव की मृत्यु हो गई और तत्पश्चात हम्मीर देव ने चित्तौड़ के साथ ही सम्पूर्ण मेवाड़ पर अधिकार कर लिया. 

अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती की कहानी


ऐतिहासिक रूप से अमीर खुसरो के विवरण की पुष्टि सारे समकालीन लेखकों ने की है. उन लेखकों में से किसी ने भी पद्मिनी और अलाउद्दीन की घटना से संबंधित कोई उल्लेख नहीं किया है. दरअसल इस तथाकथित घटना का पहली बार उल्लेख पन्द्रहवीं शताब्दी के प्रथम पच्चीस वर्षों में लिखी गई एक साहित्यिक रचना में मिलता है. इसके सौ वर्ष पश्चात मलिक मुहम्मद जायसी (शेरशाह के समकालीन) की प्रसिद्ध रचना 'पद्मावत' में इस घटना का बड़ा ही रोचक चित्रण किया गया है.
             पद्मिनी राणा रतन सिंह की अत्यन्त सुन्दर पत्नी थी. पद्मावत की मानें तो अलाउद्दीन का चित्तौड़ पर आक्रमण करने का उद्देश्य पद्मिनी को प्राप्त करना था. जब अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का घेरा डाला तो उसने यह शर्त रखी कि यदि वह पद्मिनी की एक झलक देख ले तो वह वापस चला जाए. राणा द्वारा यह शर्त स्वीकार कर लिया गया. अलाउद्दीन को किले में लाया गया और एक दर्पण की सहायता से उसे रानी पद्मिनी की झलक दिखाई गई.पद्मिनी की झलक देखकर अलाउद्दीन की उसे पाने की इच्छा और बढ़ गई. जब राणा रतन सिंह अपने सैनिकों के साथ अलाउद्दीन को छोड़ने बाहर आया तो अलाउद्दीन के सैनिकों द्वारा बंदी बना लिया गया. अलाउद्दीन ने अब राणा को छोड़ने के बदले में रानी पद्मिनी का हाथ मांगा. राजपूों ने भी अलाउद्दीन के इस छल का जवाब छल से ही देने की ठानी. पद्मिनी द्वारा यह संदेश भेजा गया कि वह अपने सेवकों के साथ आ रही है. 700 पालकियां जिनमें वीर राजपूत सैनिक बैठे हुए थे, सुल्तान के शिविर में पहुँचे. यह कहा गया कि उनमें रानी के पहरेदार हैं. इस प्रकार अलाउद्दीन धोखा खा गया. राजपूत सैनिकों ने अचानक से आक्रमण कर दिया और राणा रतन सिंह को छुड़ा लिया और रानी पद्मावती के साथ सभी चित्तौड़ पहुँचे. इसके पश्चात राणा रतन सिंह ने कुम्भलगढ़ के शासक देवपाल पर आक्रमण किया. देवपाल ने उसकी अनुपस्थिति में रानी को पाने का प्रयास किया था. इस युद्ध में देवपाल मारा गया लेकिन रतन सिंह भी घायल हो गया.कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई और उसकी चिता के साथ ही रानी ने भी जौहर कर लिया.
इस कहानी के ऐतिहासिक सत्यता को किसी भी विद्वानों ने स्वीकार नहीं किया है. मलिक मुहम्मद जायसी की यह कहानी मनगढ़ंत अधिक प्रतीत होता है. डा. गौरीशंकर ओझा, डा. बी. पी. सक्सेना व डॉ. के. एस. लाल जैसे विद्वानों ने इसकी सत्यता पर विश्वास नहीं किया है. चित्तौड़ कासामरिक महत्व था और इसी कारण अलाउद्दीन खिलजी जैसा साम्राज्यवादी शासक इस पर विजय पाना चाहता था. 





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