अलाउद्दीन खिलजी का बाजार सुधार (आर्थिक सुधार)

बाजार नियंत्रण व्यवस्था / मूल्य नियंत्रण नीति

अलाउद्दीन खिलजी के आर्थिक सुधार अथवा आर्थिक नियंत्रण दो तरह के थे - भूमि सुधार एवं बाजार नियंत्रण या बाजार सुधार. यहां हम आर्थिक सुधार के दूसरे पक्ष यानी मूल्य नियंत्रण नीति पर चर्चा करेंगे.

अलाउद्दीन खिलजी का आर्थिक सुधार अथवा बाजार सुधार
अलाउद्दीन खिलजी के बाजार सुधार ( मूल्य नियंत्रण नीति ) एवं उसकी प्रभावशीलता उसके समकालीनों के लिए आश्चर्य की बात थी. उस दौर में शासकों से इस बात की विशेष अपेक्षा रखी जाती थी कि मानव जीवन की आवश्यक वस्तुएँ विशेषकर खाद्य अन्न नगरों में निवास करने वाले लोगों को समुचित मूल्य पर उपलब्ध हो. ऐसा इसलिए था कि नगरों को समस्त संचालक शक्ति का केन्द्र माना जाता था, जबकि गांव में निवास करने वालों के प्रति यह एक आम धारणा थी कि वे गांव के लोग पिछड़े व अपनी ही संकीर्ण दुनिया में मस्त रहने वाले लोग होते हैं. मध्यकालीन शासकों में अलाउद्दीन खिलजी से पहले कोई भी शासक मूल्यों को दीर्घ काल के लिए प्रभावी रूप से नियंत्रित करने में सफल नहीं हो पाया था. इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी मध्यकालीन प्रथम सुल्तान था जिसने मूल्य नियंत्रण की समस्या का योजनाबद्ध तरीके से अध्ययन करते हुए दीर्घ काल तक तक एक स्थायी मूल्य कायम रखने में सफल रहा.

अलाउद्दीन खिलजी के बाजार नियंत्रण व्यवस्था का विस्तृत विवरण जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक 'तारीख-ए-फिरोजशाही' में किया है. बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन द्वारा दिल्ली में तीन बाजार स्थापित किए गए- पहला, खाद्य अन्न के लिए; दूसरा, कपड़े व कीमती वस्तुओं (चीनी, घी, मेवे आदि) के लिए तथा तीसरा घोड़ा, दास व मवेशियों के लिए.

**खाद्यान्न :


खाद्यान्न के मूल्यों पर नियंत्रण हेतु अलाउद्दीन द्वारा गाँवों से खाद्यान्न की आपूर्ति तथा नगर तक इसकी पहुंच हेतु परिवहन व्यवस्था का भी समुचित ध्यान रखा गया. अलाउद्दीन खिलजी का यह प्रयास था कि सरकार के पास खाद्यान्नों का पर्याप्त भंडार रहना चाहिए ताकि व्यापारी कोई कृत्रिम अभाव पैदा कर व मूल्यों में बढ़ोतरी कर मुनाफाखोरी न कर सकें. इसी दिशा में काम करते हुए सरकारी हिस्से का आधा भाग (यानी उपज का चौंथा भाग) फसल के रूप में ही एकत्रित करने के आदेश दिए गए. स्थानीय स्तर पर अनाजों को एकत्रित कर उन्हें दिल्ली भेज दिया जाता था. इस प्रकार शाही भंडार में अनाजों के पर्याप्त स्टाक पर समुचित ध्यान दिया गया.

अलाउद्दीन द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसके द्वारा उठाए गए कदम का पूर्ण रूप से पालन हो, एक अधिकारी 'शुहना' की नियुक्ति की गई. शुहना को बाजार का प्रभारी नियुक्त करते हुए उसे पर्याप्त शक्ति प्रदान की गई. उसे यह सख्त आदेश दिए गए थे कि वह मूल्य नियंत्रण संबंधी अनुदेशों का उल्लंघन करने वालों को दंड दे.

बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन द्वारा उठाए गए इन कदमों के चलते अनाजों की कीमतें गिर गईं. इस प्रकार, जौ 4 जीतल प्रति मन की दर से, गेहूँ 7.5 जीतल प्रति मन की दर से, अच्छी किस्म के चावल 5 जीतल प्रति मन की दर से बिकता था.

             अलाउद्दीन खिलजी ने अकाल जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भी महत्वपूर्ण उपाय किए. दुकानदारों को उनके इलाकों की आबादी को ध्यान में रखते हुए शासकीय अन्न भंडार से निश्चित मात्रा में अन्न उपलब्ध करा दिए जाते थे. यह ध्यान रखा जाता था कि कोई भी व्यक्ति एक बार में आधा मन से अधिक अनाज न खरीदने पाए. यद्यपि प्रतिबंध अमीरों पर लागू नहीं था और उन्हें उन पर आश्रितों की संख्या के हिसाब से अन्न मुहैया करा दिए जाते थे. बरनी के अनुसार, इन उपायों से विकट एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ना तो खाद्यान्नों की कमी हो पाई और ना ही इनकी कीमतों में कोई वृद्धि हो पाई. अकाल के समय भी अलाउद्दीन का यह आदेश था कि अकाल के पूर्व की कीमतों पर ही अनाजों की वसूली और इसकी बिक्री की जाए.

**वस्त्र बाजार एवं कीमती वस्तुओं से संबंधित विनियम :

अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित यह दूसरा बाजार था जहां कपड़े, तेल, घी, चीनी आदि बिकते थे. यह बाजार 'सराय-ए-अदल' कहलाता था. अलाउद्दीन का यह आदेश था कि देश के विभिन्न भागों सेअपितु विदेशों से लाए गए कपड़े भी केवल इसी बाजार में लाकर सरकारी दरों पर बेचे जाएं. इस सरकारी दर से अधिक मूल्य पर की जाने वाली बिक्री की स्थिति में वस्तुएँ जब्त कर ली जाती थीं एवं विक्रेता को दंडित किया जाता था. इस बाजार से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहां सभी तरह की वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु व्यापारियों का पंजीकरण किया जाता था व साथ ही उनसे इस आशय का एक इकरारनामा लिया जाता था कि वे प्रति वर्ष उतनी ही मात्रा में वस्तुएँ लाएंगे व उन्हें सरकारी दरों पर बेचेंगे.

नोट : सराय-अदल का अर्थ है- न्याय का स्थान. अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित यह सरकारी सहायता प्राप्त बाजार था, जहां सम्राट के अधीन प्रदेश व बाह्य प्रदेशों के साथ-साथ अन्य देशों से भी वस्तुएँ विक्रय हेतु लाई जाती थीं. इस बाजार से संबंधित पाँच अधिनियम थे जिसमें से पहले अधिनियम के अनुसार सराय-ए-अदल की स्थापना की गई थी.

इतिहासकार सतीश चन्द्र लिखते हैं कि "यह कोई नई कार्रवाई नहीं थी, लेकिन इनमें से दो कुछ विशिष्ट थीं जो एक नई सोच की ओर संकेत करती हैं. पहली कार्रवाई यह थी कि धनी मुल्तानी व्यापारियों को, जो दूरस्थ प्रदेशों एवं विदेशों से माल लाते थे, इस शर्त पर राजकोष से बीस लाख टंके की पेशगी दी गई कि वे अपना माल किसी भी बिचौलिए को न बेचकर सराय-अदल में सरकारी दरों पर बेचेंगे. कार्रवाई की दूसरी विशिष्टता यह थी कि इन आदेशों के अनुपालन कराने के अधिकार और दायित्व स्वयं व्यापारियों के एक संस्थान को दिया गया था. बताया जाता है कि इन युक्तियों के कारण दिल्ली में इतनी अधिक मात्रा में कपड़ा लाया गया कि वर्षों तक उसका विक्रय होने की नौबत नहीं आई."

शासन द्वारा इस बात का भी ध्यान रखा गया कि लोग महंगे कपड़े खरीदकर ऐसे लोगों को न दे दें जो उसे पास के शाहरों में अधिक दामों पर बेच दे. इस कार्य के लिए भी एक अधिकारी की नियुक्ति की गई थी.
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घोड़े, मवेशी व दास बाजार**

अलाउद्दीन द्वारा स्थापित यह तीसरा बाजार था. अलाउद्दीन ने सैनिकों को नकद व नियमित वेतन देने का निर्धारण किया था ताकि सैनिकों को उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे और वे संतुष्ट रहें. उचित मूल्य पर अच्छी किस्म के घोड़े की आपूर्ति एक आवश्यक तत्व था. उस समय घोड़ों का व्यापार लगभग एकाधिकारपूर्ण था. स्थल मार्ग से होने वाले घोड़ों के व्यापार पर अफगानियों व मुल्तानियों का एकाधिकार था. दिक्कत यह थी कि उनके द्वारा लाए जाने वाले घोड़े बाजार में बिचौलिए व दलालों के द्वारा बेचे जाते थे. परिणामत: घोड़े के व्यापारी इन शक्तिशाली दलालों से सांठ-गाँठ रखते थे ताकि बाजार में घोड़ों की कीमत बढ़ाई जा सके.
अलाउद्दीन ने ऐसे दलालों के विरुद्ध कठोर कदम उठाते हुए कई को नगर से निर्वासित कर दिया और कई को किलेबंदी की सजा दी. अलाउद्दीन ने अन्य दलालोंकी सहायता से घोड़े की कोटि व कीमत तय करवाई. प्रथम कोटि के घोड़े की कीमत 100-120 टंके के बीच, द्वितीय कोटि के घोड़े की कीमत 80-90 टंके के बीच एवं तृतीय कोटि के घोड़े की कीमत 65-70 टंके के बीच निर्धारित की गई. साधारण घोड़े व टट्टू जो प्रायः सैन्य प्रयोग में नहीं आते थे, की कीमत 10-25 टंके के बीच होती थी. इस प्रकार, यह सुधार अलाउद्दीन के सैन्य आवश्यकताओं से प्रेरित कहा जा सकता है. अलाउद्दीन यह चाहता था कि घोड़े के व्यापारी अपने घोड़े बिना किसी बिचौलिए की सहायता से सीधे दीवान-ए-अर्ज (सैन्य-विभाग) को बेचे. बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन द्वारा निर्धारित घोड़े की कीमत उसके पूरे शासनकाल में जयों की त्यों बनी रही.
इसी प्रकार दास, मवेशी तथा युवक व युवतियों की कीमतें भी तय की गई. सतीश चन्द्र कहते हैं कि यद्यपि इसके पीछे का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, क्योंकि वे न तो जीवन की आवश्यक वस्तुओं में से थे और ना ही सैनिकों हेतु उनकी कोई उपयोगिता थी. संभवतः अमीरों व धनी वर्गों (जो निजी व घरेलू कामकाज के लिए दास खरीदने के आदी थे) की सहूलियत के लिए ऐसा किया गया था.

         अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसके बाजार सुधार अर्थात बाजार नियंत्रण व्यवस्था ( मूल्य नियंत्रण प्रणाली ) हो गए. अलाउद्दीन के उत्तराधिकारी कुतुबुद्दीन मुबारक शाह ने उन सभी कानूनों को निरस्त कर दिया जो लोगों की स्वतंत्रता छीनते थे. उसके द्वारा दिल्ली से निर्वासित व कैदखाने में बंद बहुत सारे लोगों को रिहा कर दिया गया.





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