अलाउद्दीन खिलजी का आर्थिक नियंत्रण एवं भूमि सुधार/राजस्व नीति( Bhumi Sudhar)

अलाउद्दीन खिलजी का आर्थिक सुधार[भूमि सुधार], आर्थिक नियंत्रण

अलाउद्दीन खिलजी के आर्थिक सुधार दो प्रकार के थे-भूमि सुधार और बाजार सुधार.


अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था जिसने राजस्व सुधारों में रूचि लेते हुए भूमि के पैमाइश एवं माप को आधार बनाते हुए भूमि कर का निर्धारण किया.इस उद्देश्य से उसने 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नामक राजस्व विभाग की स्थापना की.

अलाउद्दीन के भूमि सुधारों का उद्देश्य दीपालपुर एवं लाहौर से कड़ा तक के क्षेत्रों के गांवों को सरकार के सम्पर्क में लाना था, जिसके लिए इन क्षेत्रों के गांव खालिसा के तहत लाए गए. धार्मिक उद्देश्यों से अनुदान में दी गई भूमि जब्त कर ली गई. अब यह तय हुआ कि इन क्षेत्रों में भू-राजस्व उपज का आधा होगा और यह आकलन भूमि की पैमाइश के आधार पर किया जाएगा.इसके पीछे यद्यपि अलाउद्दीन का उद्देश्य भू-राजस्व में वृद्धि का रहा होगा, तथापि इन कार्रवाइयों से भू-राजस्व में किस सीमा तक वृद्धि हुई, यह अज्ञात है. इतना अवश्य हुआ कि इन कार्रवाइयों से खालसा भूमि क्षेत्रों में अत्यधिक वृद्धि हो गई.



इन कार्यों के पश्चात अलाउद्दीन ने मुखियों, जमीन्दारों[खूतों] व बलाहारों [सामान्य किसान] से संबंधित आदेश जारी किया और अब खूत, मुक्कदम व चौधरी आदि हिन्दू लगान अधिकारियों के लगान वसूली सम्बन्धी अधिकार पर अंकुश लगाए गए. इस प्रकार अब इनके विशेषाधिकार समाप्त हो गए. पैतृक आधार पर लगान वसूलने वाले इन अधिकारियों का विशेषाधिकार समाप्त करने वाला अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला शासक था. 

अलाउद्दीन खिलजी के इन प्रयत्नों का प्रभाव यह हुआ कि अब खूत, मुक्कदम एवं चौधरी आदि वर्ग, जो ग्रामीण अभिजात वर्ग की श्रेणी में आते थे, के पास इतना धन नहीं रहा कि वे उत्तम वस्त्र धारण कर सकें अथवा मदिरा-पान और आमोद-प्रमोद कर सकें. उनकी स्थिति दयनीय हो गई थी और उनकी स्त्रियों को  मुस्लिम घरों में जाकर काम करना पड़ता था. [बरनी के अनुसार]
अब खूत, मुक्कदम एवं चौधरी को भी सामान्य लोगों की तरह चराई कर एवं घरी कर
देने के लिए बाध्य किया गया. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि वे अपने हिस्से के भू-राजस्व का भार किसी और पर न डाल सकें. इतना ही नहीं बल्कि अब उन्हें भू-राजस्व वसूली करने के बदले मिलने वाले खूती शुल्क से भी वंचित कर दिया गया.


भू-राजस्व वसूली के लिए खूत, मुक्कदम एवं चौधरी के अलावे मुतसर्रिफ, कारकून तथा आमिल थे जो दीवान-ए-विजारत के अधीन थे. दीवान-ए-मुस्तखराज राजस्व वसूली से संबंधित एक पृथक विभाग था जिसकी स्थापना अलाउद्दीन खिलजी ने की थी.

भू-राजस्व सुधार अथवा भूमि सुधार करते हुए अलाउद्दीन ने यह कोशिश की कि राजस्व अथवा कर प्रणाली का संचालन ईमानदारी से हो सके. अलाउद्दीन के काल में भू-राजस्व की दर सर्वाधिक थी जो उपज का आधा भाग निश्चित किया गया. जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि  खालसा भूमि में काफी वृद्धि हो गई और इस कारण पर्याप्त संख्या में आमिल, गुमाश्ते व मुतसर्रिफ जैसे अधिकारी भी नियुक्त किए गए. अलाउद्दीन चाहता था कि इन अधिकारियों के लेखाओं का सख्ती से अंकेक्षण कार्य हो. गांव के पटवारी के लेखाबही के आधार पर हिसाब में एक जीतल भी यदि उनके पास बचा हुआ पाया जाता था तो उन्हें कठोर दंड दिए जाते थे. अलाउद्दीन उन्हें एक स्तरीय जीवन जीने लायक पर्याप्त वेतन देने के पक्ष में था और इसमें उसे कोई परेशानी नहीं थी, तथापि वह रिश्वत लेने और भ्रष्ट आचरण को बर्दाश्त नहीं करना चाहता था.

करों की अधिकता ने अलाउद्दीन के काल में कृषि कार्य को प्रभावित किया. वह प्रथम शासक था जिसने भूमि की वास्तविक आय पर लगान निश्चित किए और इसके लिए 'बिस्वा' को इकाई माना गया. मसाहत अर्थात भूमि का मापन को अलाउद्दीन ने पनर्जीवित किया. उसके कर प्रणाली का यह मूलभूत सिद्धांत था कि विशेषाधिकारयुक्त वर्ग अथवा सबल वर्ग अपने लगान के बोझ को निर्बल पर न डाल पाएं. इस प्रकार पैमाइश एवं सबल वर्गों का के द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न तथा पटवारियों के लेखा बही की सहायता से स्थानीय राजस्व अधिकारियों के खाते का अंकेक्षण संबंधी कार्य ऐसे कार्य थे जिसने परवर्ती शासकों के लिए एक आदर्श स्थापित किया व बाद के काल में शेरशाह और अकबर जैसे शासकों ने इसे अपनाया.



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