अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व सिद्धांत

[अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व सिद्धांत]

अलाउद्दीन खिलजी निरंकुशता में विश्वास रखने वाला एक पूर्णरूपेण निरंकुश शासक था जिसके राजत्व का सिद्धांत महत्वपूर्ण विशेषताओं को प्रतिबिम्बित करता था. अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन खिलजी के मानवतावादी सिद्धांतो को कमजोर शासन का परिचायक एवं तत्कालीन संदर्भ में अनुपयुक्त मानते हुए अस्वीकार कर दिया. उसने आतंक अथवा भय के सिद्धांत को अपने शासन का आधार बनाने का प्रयास किया.

अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धांत


अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व का सिद्धांत मुख्यत: तीन बातों पर आधारित था-
* निरंकुश शासन
* राजनीति और धर्म का अलगाव
* साम्राज्यवादी नीति

निरंकुश शासन

अलाउद्दीन खिलजी ने इस सिद्धांत को अपने शासन का मूल सिद्धांत मानते हुए इसे अमीरों पर भी लागू किया. यद्यपि अलाउद्दीन ने खलीफा को सम्मान दिया, तथापि प्रशासन में उसके हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया गया. अमीर खुसरो ने  अलाउद्दीन को अपने ग्रन्थ ' खजाइनूल फुतूह ' में य' युग विजेता ', ' पृथ्वी के शासकों का सुल्तान ', 'विश्व का सुल्तान' आदि उपाधियों से अलंकृत करते हुए उसे ऊँचा उठाने का प्रयास किया है.
अलाउद्दीन खिलजी  बलबन द्वारा स्थापित गुप्तचर तंत्र को पुनः सक्रिय करते हुए सूचना प्राप्त करता था. अमीरों के आपस में मिलना-जुलना प्रतिबंधित कर दिया गया. बगैर सुल्तान के पूर्व अनुमति के वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता था. वस्तुतः अलाउद्दीन बलबन के इस तर्क से सहमत था कि जनता के पास इतना धन नहीं होना चाहिए कि उनके मन में विद्रोह का ख्याल आए. इसी नीति के प्रेरित होकर इनाम अथवा वक्फ में दी गई भूमि व पुण्य के लिए प्रदत्त जमीनें जब्त करने के आदेश दिए गए. इसका प्रभाव यह हुआ कि जलालुद्दीन के काल के सम्पन्न अमीर तबाह हो गए उनके जमा धन को जब्त कर लिया गया. बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन द्वारा किया गया भूमि सुधार भी लोगों को दरिद्र बनाने के उद्देश्य से ही प्रेरित था, ताकि वे विद्रोह करने की स्थिति में ना हों.

अलाउद्दीन ने बलबन के निरंकुशतावाद को और सख्त बनाया. यद्यपि बलबन के राजत्व सिद्धांत एवं अलाउद्दीन खिलजी के राजत्व सिद्धांत कुछ बातों में भिन्न थे. बलबन के अनुसार, सुल्तान ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया, लेकिन अलाउद्दीन का यह मत था कि बगैर शक्ति के सत्ता हासिल नहीं की जा सकती. सुल्तान ना तो किसी ईश्वरीय कृपा से सत्ता प्राप्त करता है और ना ही किसी के सहयोग से. वह अपनी वर्चस्व व शक्ति से ही सत्ता हासिल करता है और जब तक वह शक्तिशाली रहता है, यह सत्ता भी उसके साथ होती है. इस प्रकार अलाउद्दीन के राजत्व सिद्धांत की एक विशेषता शासन की निरंकुशता थी, जिसे अपने व्यवहार से उसने और मजबूती प्रदान की.

राजनीति एवं धर्म का अलगाव

अलाउद्दीन जलालुद्दीन के इस तर्क से सहमत था कि भारतीय परिस्थितियों में किसी इस्लामी राज्य की स्थापना का कार्य सम्भव नहीं है. अलाउद्दीन पहला शासक था जिसने राजनीति को धर्म से अलग रखा. उसने ' यामून-उल-खिलाफत '[खलीफा का नायब] उपाधि ग्रहण की थी अर्थात् नाममात्र के लिए खलीफा की परंपरा को स्थापित करना. अलाउद्दीन ने कभी खलीफा से सुल्तान पद की स्वीकृति को आवश्यक नहीं माना, अत: उसके लिए कोई प्रयत्न भी नहीं किए गए. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि खलीफा को उसने यथोचित सम्मान दिया, तथापि शासन में उसके हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया. बरनी के अनुसार, दिल्ली के काजी मुगीस से हुई बातचीत में उसने स्पष्ट रूप से कहा कि " मैं नहीं जानता कि शरा के अनुसार क्या उचित है अथवा क्या अनुचित. मैं अपनी प्रजा को ऐसे आदेश देता हूँ जो उनकी और राज्य की भलाई के लिए आवश्यक समझता हूँ. "

अलाउद्दीन ने इस्लाम के सिद्धांतों का आश्रय शासन संचालन हेतु नहीं लिया. न तो खलीफा के नाम का सहारा लिया गया और ना ही उलेमाओं से परामर्श आवश्यक समझा गया. अलाउद्दीन के शासन का आधार विशुद्ध निरंकुशवाद पर आधारित था.

साम्राज्यवाद

बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी ने विश्व विजय की योजना भी बनाई थी. सिकन्दर द्वितीय अथवा 'सिकन्दर सानी' की उपाधि ग्रहण करते हुए इसे अलाउद्दीन द्वारा सिक्कों पर भी उत्कीर्ण करवाया गया. अलाउद्दीन ने अपने मित्र दिल्ली के कोतवाल अलाउल मुल्क के सुझाव पर अपनी योजना छोड़ दी. अलाउद्दीन के साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के कारण उसके सिंहासन पर आसीन होने के बाद दिल्ली सल्तनत के साम्राज्यवादी युग का सूत्रपात हुआ. अलाउद्दीन ने बलबन के तुर्की नस्ल की श्रेष्ठता के सिद्धांत का त्याग करते हुए योग्यता के आधार पर नियुक्तियां की. गैर-तुर्कों के साथ पक्षपात नहीं किया गया एवं उन्हें प्रशासन में उन्नति का पूरा अवसर दिया गया. इसी नीति के चलते जफर खां, नुसरत खां एवं मलिक काफूर जैसे अनेक गैर-तुर्क प्रशासन में उच्च पदों पर आसीन हो सके. मलिक नायक नामक हिन्दू के हाथों में ऐसी सेना की कमान दी गई जिसने मंगोलों को बुरी तरह पराजित किया था. इस सेना में भारी संख्या हिन्दुस्तानी मुसलमानों की भी थी.

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