दिल्ली सल्तनत काल में स्थापत्य कला अथवा वास्तुकला का विकास

( सल्तनतकालीन स्थापत्य कला )( दिल्ली सल्तनत काल की स्थापत्य कला की प्रमुख विशेषताएँ ) ( सल्तनत काल में वास्तुकला )

 भारत में तुर्कों का आगमन एवं 1 3 वीं सदी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना का काल उथल-पुथल, विकास और हलचल का काल था. इसके आरंभिक चरण में जहां बड़े पैमाने पर विनाश दृष्टिगोचर होता है, जिसमें युद्ध व मृत्यु, मंदिरों को तोड़ा जाना, महलों व नगरों को लूटकर इन्हें ध्वस्त किया जाना शामिल है; वहीं इसका एक दूसरा पहलू भी है. जैसे ही कोई प्रदेश विजित कर लिया जाता था अथवा सल्तनत की अधीनता स्वीकार कर लेता था, वैसे ही शांति और विकास की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी. उत्तरी भारत में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हुई जहां (एक बड़े भाग पर) लगभग 3 0 0 वर्षों तक दिल्ली सल्तनत का प्रत्यक्ष शासन था.

सल्तनतकालीन स्थापत्य कला

                दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य कला पर विचार करते हुए इतिहासकार सतीश चन्द्र लिखते हैं कि सल्तनत के शासकों की पहली अथवा आवश्यक आवश्यकताओं में से एक रहने के लिए भवन व समर्थकों अथवा अनुचरों के लिए पूजा-स्थलों के निर्माण की थी.इस कार्य के लिए आरंभ में मंदिरों एवं अन्य भवनों को ही मस्जिद में रूपान्तरित कर दिया गया. 'अढ़ाई दिन का झोपड़ा' जिसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया था, मूलत: एक बौद्ध मठ अथवा बिहार था. 'कुव्वत-उल-इस्लाम' पूर्व में एक जैन मंदिर था, जिसे बाद में विष्णु मंदिर बना दिया गया था. इस्लाम के आगमन से पूर्व की कला को 'शहतीरी शिल्प कला' कहा गया है. इस कला की विशेषता आड़ी व खड़ी रेखाएं थी जो स्तम्भों पर प्रकोष्ठों की सहायता से कड़ियां रखकर बनाई जाती थी. इस शिल्प कला की एक विशेषता इसकी धार्मिक मौलिकता भी थी. इस्लामी स्थापत्य की प्रमुख विशेषता 'मेहराब एवं गुम्बद' का प्रयोग था. दिल्ली में किए गए निर्माण में गर्भ-गृह के सामने नक्काशीयुक्त मेहराबों का मुखौटा एक नया निर्माण था. किसी मानव अथवा पशु की आकृति को उत्कीर्ण करना गैर-इस्लामी समझे जाने के कारण ऐसा नहीं किया गया. इस्लाम में जीवित वस्तुओं का चित्रण निषिद्ध होने की वजह से लिखावट व ज्यामितीय डिजाइनों का चित्रण अथवा अंकण प्रचलित था. अतः फूलों की लताओं व कुरान की आयतों को इस प्रकार उत्कीर्ण किया गया कि वे बड़े कलात्मक तरीके से एक-दूसरे के साथ गूंथ दिए गए थे. तुर्कों के समय कला का प्रमुख नमूना अरबी लिपि थी. अलंकरण की संयुक्त लिपि 'अरबस्क' कहलाती थी. जब तुर्कों ने अपने भवन बनाने शुरू किए तो इसके लिए उन्होंने अधिकांशतः देशी शिल्पियों को ही नियुक्त किया जिनकी अपने कला-कौशल के लिए प्रसिद्धि थी. बेल, घंटी, स्वास्तिक, कमल जैसे हिन्दू रूपांकनों से भी काफी कुछ ग्रहण किया गया. बाद में पश्चिम एशिया से भी कुछ विशेषज्ञों का भारत आगमन हुआ. तुर्कों द्वारा अपने भवनों में बड़े पैमाने पर मेहराबों एवं गुम्बदों का प्रयोग किया गया. हालाँकि सतीश चन्द्र के अनुसार, यह मेहराब व गुम्बद कोई तुर्क अथवा मुस्लिम आविष्कार नहीं था, बल्कि अरबों द्वारा इसे बाइजेन्टाइन साम्राज्य से ग्रहण किया गया और अपना लिया गया. भारतीयों की तरह तुर्कों के भी अलंकरण शौकीन होने के चलते भारतीय पत्थर- तराशों के कौशल का भी भरपूर प्रयोग किया गया.तुर्कों ने लाल बालू-पत्थर के रंग को और अधिक स्पष्ट दर्शाने के लिए पीले बालू-पत्थर अथवा संगमरमर की पट्टियों का प्रयोग किया. मेहराब एवं गुम्बद के प्रयोग के अनेक लाभ थे. गुम्बद से भवनों को मनोरम क्षितिज रेखा प्राप्त हुई व धीरे-धीरे कलाकारों के आत्मविश्वास बढ़ते गए व गुम्बद ऊंचे होते चले गए. एक चौकोर भवन पर गोल गुम्बद बनाने व उसे अधिकतम ऊँचाई देने हेतु कई प्रयोग किए गए. इस प्रकार अनेक ऊंचे-ऊंचे भवनों का निर्माण हुआ. मेहराब एवं गुम्बद की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि अब छत को सहारा देने हेतु बहुत सारे खंभों की आवश्यकता नहीं रही. अब बड़े-बड़े मंडप का निर्माण संभव और सहज हो गया. गुम्बद व मेहराब के लिए मजबूत जोड़ यथा- सीमेन्ट चाहिए था, अन्यथा इनमें प्रयुक्त पत्थर अपने स्थान पर टिके नहीं रह सकते थे. इसके लिए तुर्कों ने अपने भवनों में अच्छी कोटि के चूने-गारे का इस्तमाल किया. इस प्रकार, उत्तर भारत में नई वास्तुशैली एवं बेहतर गारे के प्रयोग का चलन आरंभ हुआ.

 **मीनार**

1 3वीं सदी के दौरान तुर्कों द्वारा निर्मित सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं भव्य निर्माण कुतुब मीनार थी.हालाँकि मीनार निर्माण की परंपरा भारत में पूर्व से थी लेकिन कुतुब मीनार कई तरह से एक अनोखा निर्माण था. कुतुब मीनार की आकृति शंक्वाकार होने के कारण इसकी प्रचंड ऊँचाई अत्यधिक प्रभावोत्पादक एवं मनोरम लगती है. कुतुबमीनार 71.4 मीटर (238 फीट) ऊँची है. मूलतः यह एक चार मंजिला इमारत थी, लेकिन फिरोज तुगलक ने विद्युतपात से क्षतिग्रस्त हुए इसके शीर्ष की मरम्मत करवाई और इसमें एक पांचवीं मंजिल भी जोड़ दी गई. इस मीनार का मुख्य आकर्षण इसके छज्जों को बनानें में प्रयुक्त हुई कौशल में निहित है. ये छज्जे बाहर निकले हुए हैं व 'स्टेलेक्टाइट हनी कोमिंग तकनीक' द्वारा मीनार से जुड़े हुए हैं.

 **मकबरा**

 मक़बरा निर्माण शैली का जन्मदाता इल्तुतमिश को कहा जाता है. अपने शासनकाल के अन्त में इल्तुतमिश द्वारा अपने लिए बनवाए गए मकबरे में वास्तुकला की हिन्दू व मुस्लिम परंपराओं का मिश्रण था.इस प्रकार इल्तुतमिश द्वारा बनवाए गए सुल्तान गढ़ी का मकबरा प्रथम सल्तनतकालीन मकबरा है.बलबन द्वारा अपने लिए बनवाए जाने वाले मकबरे व लालमहल में मेहराबों का सही रूप में निर्माण हुआ है.यह इस्लामी कला का श्रेष्ठ प्रतीक है. शुद्ध इस्लामी पद्धति से निर्मित यह भारत का पहला मकबरा है. खिलजी काल में बड़े पैमाने पर भवनों का निर्माण हुआ. अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित'अलाई दरवाजा' (कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद का प्रवेश द्वार) के निर्माण में वैज्ञानिक विधि प्रयुक्त हुई है. इसमें बनाई गई घोड़े के नाल की आकृति वाली मेहराब देखने में बहुत मनोरम लगती है. मार्शल ने इसे "इस्लामी स्थापत्य कला के खजाने का सबसे सुन्दर हीरा कहा है." अलाई दरवाजा पहली ऐसी इमारत है जिसमें केवल इस्लामी पद्धतियों का ही उपयोग हुआ है. इस काल के दौरान मस्जिद संबंधी शिल्प कला का भी विकास हुआ. इसके लिए निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के निकट निर्मित जमात खाना मस्जिद का उदाहरण दिया जा सकता है. हालाँकि तुगलक काल में भी भवन निर्माण संबंधी कार्य बड़े पैमाने पर हुआ, परन्तु इस काल को उत्कर्ष के साथ ही पतन के आरंभ का द्योतक भी माना जाता है. गयासुद्दीन के मकबरे ने वास्तुकला को एक नई दिशा दी. गयासुद्दीन के मकबरे में संगमरमर व बलुआ पत्थर दोनों का मिला-जुला प्रयोग हुआ था. इसका शिखर हिन्दू वास्तुकला के प्रतीक कलश (आमलक) के समान है. फिरोज तुगलक द्वारा निर्मित इमारतों में मदरसे तथा फिरोजशाह कोटला का नगर, किला प्रसिद्ध है.फिरोज तुगलक द्वारा अपने वजीर खाने जहां तेलंगानी का मक़बरा दिल्ली में निर्मित प्रथम अष्टभुजाकार मकबरा है. फिरोज तुगलक के लगभग सभी भवनों के अलंकरण में कमल का रूपांकन बहुतायत से मिलता है.तुगलक वास्तुकला की एक उल्लेखनीय विशेषता ढ़ालू दीवारें थी. इसे ' निप्रवण ' कहा जाता है.

लोदियों ने मकबरों को ऊंचे चबूतरे पर निर्मित कराया था. उन्होंने अपने भवनों में अनगढ़े पत्थरों और चूने के प्लास्टर का प्रयोग करना जारी रखा. लोदीकालीन मकबरे दो भागों में रखे जा सकते हैं- 1. सुल्तानों द्वारा निर्मित अष्टभुजी मकबरे व 2. लोदियों के अमीरों द्वारा निर्मित चतुर्भुजी मकबरे. सुल्तान सिकन्दर लोदी के समय एक गुम्बद के स्थान पर दो गुंबद शैली विकसित हुई थी. लोदी काल को ' मकबरों का काल ' कहा जाता है. कुछ मकबरों का निर्माण उद्यानों के बीच में किया गया. दिल्ली का लोदी उद्यान इसका एक उत्तम उदाहरण है. आगे मुगलों द्वारा इसकी कई विशेषताएँ अपनाई गई और उनका उत्कर्ष शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल में देखा जा सकता है.सैय्यद तथा लोदियों के समय दिल्ली के आसपास लगभग सात वर्गाकार मकबरों का निर्माण कार्य किया गया. इन्हें सात विभिन्न गुंबद के  से जाना जाता है.

1. बड़ा खां गुम्बद
2. दादी का गुंबद
3. पोती का गुंबद
4. छोटे खां का गुंबद
5.बड़ा गुंबद
6. शहाबुद्दीन बाज खां का गुंबद
7. शीश गुम्बद

 दिल्ली सल्तनत के विखंडन के समय तक भारत के विभिन्न भागों में स्थापित अलग-अलग राज्यों में विशिष्ट वास्तु शैलियां भी विकसित हो चुकी थीं. इनमें से कई वास्तुकला की स्थानीय परंपराओं से अत्यन्त प्रभावित थी. इस प्रकार इस काल में न केवल बड़े पैमाने पर भवनों के निर्माण कार्य हुए, अपितु वास्तुकला की मुस्लिम और हिन्दू परंपराओं एवं शैलियों का संयोजन कार्य भी हुआ. 

 **सल्तनतकालीन स्थापत्य कला के चर्चित नमूने**[इमारतों की सूची]

1. कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद....कुतुबुद्दीन ऐबक....दिल्ली

2. कुतुबमीनार....कुतुबुद्दीन ऐबक व इल्तुतमिश....दिल्ली

3. अढ़ाई दिन का झोपड़ा....कुतुबुद्दीन ऐबक....अजमेर

4. सुल्तान गढ़ी....इल्तुतमिश....दिल्ली

5. लाल महल....बलबन....दिल्ली

6. अलाई दरवाजा....अलाउद्दीन खिलजी....दिल्ली

7. गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा....गयासुद्दीन तुगलक....दिल्ली

8. आदिलाबाद का किला....मुहम्मद बिन तुगलक....दिल्ली

9. फिरोजशाह का मकबरा....फिरोज तुगलक....दिल्ली

1 0. बहलोल लोदी का मकबरा....बहलोल लोदी....दिल्ली

1 1. मोठ की मस्जिद....सिकन्दर लोदी का प्रधानमंत्री मियांमुवा .... दिल्ली

कुछ और सूची इस प्रकार हैं-


12. इल्तुतमिश का मकबरा....इल्तुतमिश....दिल्ली

13. जामा मस्जिद....इल्तुतमिश....बदायूं

14. हजार सितून......अलाउद्दीन खिलजी....दिल्ली

15. उरवा मस्जिद....मुबारक खिलजी....बयाना

16. काली मस्जिद.....जूनाशाह खानेजहां....दिल्ली

17. खिर्की मस्जिद....जूनाशाह खानेजहां....दिल्ली


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