मुगल शासन काल में शिक्षा एवं साहित्य का विकास

मुगलकालीन शिक्षा एवं साहित्य

मुगल शासकों ने शिक्षा एवं साहित्य के विकास में सक्रिय और सकारात्मक योगदान किया. मुगल काल में मकतब [ प्राथमिक शिक्षा ] एवं [ मदरसा ] उच्च शिक्षा की व्यवस्था की गई थी. इसी प्रकार मुगल काल में मौलिक एवं अनूदित साहित्य की प्रसिद्ध रचनाएँ [ RACHNAYE ] उपलब्ध होती है. मुगल शासकों में शिक्षा एवं साहित्य को लेकर दिलचस्पी थी और शिक्षा एवं साहित्य के विकास के लिए उन्होंने अनेक विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया था.

मुगलकालीन शिक्षा व्यवस्था

मुगल काल में शिक्षा, साहित्य एवं साहित्यिक रचनाएँ
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बाबर के काल में 'शुहरते आम' नामक विभाग शिक्षा की देख-रेख का कार्य करता था. बाबर को अपने अल्प शासनकाल के दौरान शिक्षा एवं साहित्य के उत्थान हेतु ज्यादा कुछ करने का अवसर नहीं मिला, लेकिन बाद के मुगल शासकों ने इसके मद्देनजर सक्रिय सहयोग किया. 

हुमायूँ भी शिक्षा के विकास में दिलचस्पी लेता था. इसके मद्देनजर हुमायूँ ने दिल्ली में माहम अनगा के सहयोग से ' मदरसा-ए-बेगम ' की स्थापना की थी. हुमायूँ सदैव अपने साथ पुस्तकालय रखता था. हुमायूँ का शासनकाल अस्त-व्यस्त रहा और उसे भी इसके उत्थान हेतु ज्यादा कुछ करने का अवसर नहीं मिला. हुमायूँ गणित, खगोल एवं भूगोल के अध्ययन पर विशेष बल दिया. दिल्ली में उसके द्वारा स्थापित मदरसे में इन्हीं विषयों को लेकर शिक्षा दी जाती थी.


मुगल सम्राट अकबर यद्यपि शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाया था, तथापि उसने शिक्षा के विकास के लिए फतेहपुर सीकरी, आगरा, लाहौर आदि अनेक स्थानों पर मकतब व मदरसों का निर्माण करवाया. अकबर के शासनकाल में फारसी को काफी प्रस्रय प्राप्त था.एक फरमान जारी कर अकबर ने गणित एवं खगोल विद्या को अनिवार्य बनाया था. बेसिक शिक्षा प्रणाली में सुधार कर अकबर ने शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया. इन सुधारों के परिणामस्वरूप काफी संख्या में हिन्दुओं ने भी फारसी का अध्ययन किया. मकतबों व मदरसों में भेदभाव नहीं किये जाते थे. अकबर द्वारा व्यावसायिक शिक्षा को भी तव्वजो दी गई. कारखानों में वस्तुओं के निर्माण के साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की गई थी.

जहाँगीर ने शिक्षा को लेकर एक फरमान निकाला था कि यदि किसी संपन्न व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में राज्य उसकी सम्पति का अधिग्रहण कर मदरसों का निर्माण कराये. जहाँगीर के काल में आगरा शिक्षा का एक मुख्य केन्द्र था.

शाहजहाँ ने भी अपने शासनकाल में इन परंपराओं को जीवित रखा और इसी के मद्देनजर अनेक मदरसों का निर्माण करवाया. शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में जामा मस्जिद के निकट स्थापित 'दारूल-बका' प्रसिद्ध मकबरा था.शाहजहाँ ने जिज-ए-शाहजहानी नामक नक्षत्रों की एक टेबल तैयार की थी. शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा ने भी आगरा के जामा मस्जिद के समीप एक मदरसे का निर्माण करवाया था.  शाहजादा दाराशिकोह स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त था और विद्वानों का संरक्षक था.

औरंगजेब ने भी शिक्षा के विकास में योगदान किया और मदरसों का निर्माण कार्य करवाया. औरंगजेब द्वारा निर्मित मदरसे में 'मदरसा-ए-रहीमियां' प्रमुख है. औरंगजेब शिक्षक एवं छात्रों को आर्थिक सहायता भी प्रदान करता था. औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा ने दिल्ली में 'बैतुल उलूम' नामक एक विद्यालय की स्थापना की थी, जिसमें अभिजात वर्ग के लोगों के साथ-साथ मध्य वर्गीय लोग भी शिक्षा ग्रहण कर सकते थे. 

मकतबों व मदरसों में फारसी भाषा में शिक्षा दी जाती थी. विभिन्न मदरसों में भिन्न-भिन्न शिक्षा दी जाती थी. लखनऊ में स्थित फरहंगी महल नामक मदरसा न्याय की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध था. इसी प्रकार स्यालकोट का मदरसा व्याकरण की शिक्षा के लिए प्रसिद्ध था. मुगल काल में छात्रों को तीन प्रकार की उपाधियां प्रदान की जाती थी- तर्क एवं दर्शन के विद्यार्थी को फाजिल, धार्मिक शिक्षा के विद्यार्थी को आमिल एवं साहित्य के विद्यार्थीयों को काबिल. मुगल काल में बनारस शिक्षा के लिए विशेष चर्चित था.

मुगलकालीन साहित्य

मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही भारत में फारसी भाषा साहित्य के एक नए युग का आरंभ हुआ. मुगलोंकी राजभाषा फारसी थी. इस काल में फारसी को दरबार में विशेष स्थान प्राप्त था. मुगल शासन काल के दौरान फारसी भाषा की दो शैलियाँ विकसित हुई- भारतीय शैली एवं ईरानी शैली. भारतीय शैली का प्रवर्तक अबुल फजल था. 

बाबर साहित्य में विशेष दिलचस्पी लेता था. उसने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा ' तुजुक-ए-बाबरी ' की रचना की. बाबर ने एक नवीन काव्य-शैली ' मुबइयान ' को प्रारंभ किया था. हुमायूँ के शासनकाल में मिर्जा हैदर दोगलत ने 'तारीखे-रशीदे' नाम से फारसी में ग्रन्थ लिखा था. गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा की रचना की.

अबुल फजल ने 'अकबरनामा' में अकबर के दरबार में 59 श्रेष्ठ कवियों का जिक्र किया है. दरबारी लेखन की परंपरा अकबर के समय में ही प्रारंभ हुई.बदायूंनी कृत 'मुन्तखब-उत्-तवारीख' हिन्दुस्तान का आम इतिहास है. अकबर का राजकवि फैजी था जिसके नेतृत्व में अकबर ने 'अनुवाद विभाग' की स्थापना की थी. इसी विभाग के अन्तर्गत् महाभारत का 'रज्मनामा' नाम से फारसी भाषा में अनुवाद किया गया. बदायूंनी ने रामायण का, टोडरमल ने भागवत पुराण का , इब्राहीम सरहिन्दी ने अथर्ववेद का, फैजी ने गणित के ग्रंथ लीलावती का अनुवाद किया. अकबर के काल में ही कुरान का पहली बार अनुवाद किया गया. अकबर के काल के सर्वाधिक प्रसिद्ध पद्यकार गिजाली थे.

जहाँगीर के काल की रचनाओं में स्वयं जहाँगीर लिखित 'तुजुक-ए-जहांगीरी' एक उल्लेखनीय रचना है. शाहजहाँ के काल की साहित्यिक रचनाओं में अब्दुल हमीद लाहौरी कृत पादशाहनामा, मुहम्मद अमीन कजवीनी कृत पादशाहनामा एवं इनायत खाँ कृत शाहजहांनामा प्रमुख कृति है. दाराशिकोह एक उच्च कोटि का विद्वान था जिसने स्वयं की देख-रेख में भागवत गीता एवं योग वशिष्ठ का फारसी में अनुवाद कराया था. शाहजहाँ के दरबारी कवि पं. जगन्नाथ ने रस गंगाधर एवं गंगालहरी की रचना की.

औरंगजेब यद्यपि इतिहास लेखन का विरोधी था, लेकिन खफी खाँ ने गुप्त रूप से उसके शासनकाल में मुन्तखब-उल-लुबाब की रचना की. उसके शासनकाल की एक अन्य महत्वपूर्ण रचना है- मआसिरे आलमगीरी. इसकी रचना मुहम्मद साकी ने की थी. जदुनाथ सरकार ने इस कृति को मुगल राज्य का गजेटियर कहा है. औरंगजेब ने अनेक अरबी ग्रंथों की सहायता से न्याय एवं कानून की पुस्तक 'फतवा-ए-आलमगीरी' का संकलन करवाया था. फारसी भाषा की यह कृति भारत में रचित मुस्लिम कानून का सबसे बड़ा डाइजेस्ट स्वीकारा गया है.

मुगल काल हिन्दी साहित्य के दृष्टिकोण से भी उत्कृष्ट काल था. इस काल के प्रसिद्ध हिन्दी कवियों में सूरदास, तुलसीदास आदि उल्लेखनीय हैं. तुलसीदास अकबर के समकालीन थे. इनकी प्रसिद्ध कृति 'रामचरितमानस' है, जो अवधी में लिखी गई है. अकबर ने बीरबल को कविप्रिय की उपाधि प्रदान की थी. केशवदास जहाँगीर के काल के श्रेष्ठ कवि थे. कवि बिहारी को जयसिंह ने संरक्षण प्रदान किया था. शाहजहाँ के काल में पं. जगन्नाथ का महत्वपूर्ण स्थान था.

गुजराती, मराठी, बांग्ला व उर्दू साहित्य का भी मुगल में काफी विकास हुआ. इन क्षेत्रीय भषाओं में भी साहित्य सर्जना की गई. यद्यपि उर्दू सल्तनत काल में ही अस्तित्व में आ गई थी. प्रारंभिक काल में इसे 'जवान-ए-हिन्दवी' कहा जाता था. अमीर खुसरो प्रथम रचनाकार था जिसने उर्दू को अपनी कविताओं का भाषा बनाया. दक्षिण भारत के सुल्तानों ने भी उर्दू को प्रोत्साहित किया था. मुगल बादशाह मुहम्मद शाह पहला मुगल बादशाह था जिसने उर्दू को प्रस्रय दिया था. बाद के काल में उर्दू को 'रेख्ता' नाम से जाना गया.

मुगलकालीन रचनाएँ [ Mugal Kalin Rachnaye ] एवं मुगल कालीन कवि

 यहाँ मुगल काल की अनूदित रचनाएँ दी जा रही हैं. मौलिक रचना की सूची नीचे देखें.


[अनूदित पुस्तक - अनुवाद की भाषा - अनुवादकर्ता ]

1. रज्मनामा - फारसी भाषा - नकीब खां एवं बदायूंनी


2. रामायण - फारसी भाषा - अब्दुल कादिर बदायूंनी

3. अथर्ववेद - फारसी भाषा - इब्राहीम सरहिन्दी

4. योग वशिष्ठ - फारसी भाषा - दाराशिकोह

5. भागवतपुराण - फारसी भाषा - राजा टोडरमल

6. भगवद्गीता - फारसी भाषा - दाराशिकोह

7. कालिया दमन - फारसी भाषा - अबुल फजल

8. लीलावती - फारसी भाषा - फैजी

9. राजतरंगिणी - फारसी भाषा - मौलाना मुहम्मद शहाबादी

मुगलकालीन मौलिक रचनाएँ एवं कवि
[ Mugal Kalin Rachnaye Evam Kavi ]

1. तुजुक-ए-बाबरी - तुर्की भाषा - बाबर

2. दीवान (काव्य संग्रह) - तुर्की - बाबर

3. रिसाल-ए-उसज - तुर्की - बाबर

4. मुबइयान (पद्य शैली में कानून की पुस्तक) - तुर्की भाषा - बाबर

5. हुमायूंनामा - फारसी भाषा - गुलबदन बेगम

6. तारीख-ए-रशीदी - फारसी भाषा - मिर्जा हैदर दोगलात

7. तारीखे शेरशाही - फारसी भाषा - अब्बास खाँ सरवानी

8. तारीख-ए-अल्फी - फारसी भाषा - मुल्ला दाऊद

9. अकबरनामा - फारसी भाषा - अबुल फजल

10. आइन-ए-अकबरी - फारसी भाषा - अबुल फजल

11. तबकाते अकबरी - फारसी भाषा - निजामुद्दीन अहमद

12. मुन्तखब-उत्-तवारीख - फारसी भाषा - अब्दुल कादिर बदायूंनी

13. तुजुके जहांगीरी - फारसी भाषा - जहाँगीर, मौतमिद खाँ, मुहम्मद हादी

14. पादशाहनामा - फारसी भाषा - अब्दुल हमीद लहौरी

15. पादशाहनामा - फारसी भाषा - मोहम्मद अमीन कजवीनी

16. फुतूहात-ए-आलमगीरी - फारसी भाषा - ईश्वर दास नागर

17. मासिर-ए-आलमगीरी - फारसी भाषा -मुहम्मद साकी

18. मुन्तखब-उल-लुबाब - फारसी भाषा - खफी खाँ

19. इकबालनामा-ए-जहांगीरी - फारसी भाषा- मौतमिद खाँ

20. तजकिरात-उल-वाकयात - फारसी भाषा - जौहर आफतावची

21. वाकयात-ए-मुश्ताकी - फारसी भाषा - रिजकुल्लाह मुश्ताकी

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